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Wednesday, 13 June 2012

May be i am tired.

जिंदगी कहाँ जा रही है मेरी 
मुझे जब रास्ते का पता ही नहीं.
मंजिल ही रास्ता है या रास्ता ही मंजिल
कोई बता दे मुझे .


भटका हुआ मुसाफिर हूँ अब,
राह नयी दिखा दे मुझे. 
पक्की सड़कें अब भाती नहीं मुझे,
जंगल का पता कोई दे दे मुझे.


मैं यूँ ही चला था 
मेरे जीवन में ध्रुवतारा कहाँ था.
संभल के चल सकता था
मगर सहारा कहाँ था.


हमसफ़र नहीं जीवन में कोई भी
अकेला भी कहाँ तक चलूँ मैं?
पहिये का सहारा चाहिए अब
दो पांव से कब तक चलूँ मैं.


 दास्ताँ अपनी अलग है, 
तुम से कहाँ तक कहूँ मैं,
दिल पत्थर बन गया..
दर्द कब तक सहूँ मैं.......





Saturday, 15 October 2011

सांझ पहर

सांझ पहर, धुंधलके से पहले 
आसमान जब हो रहा हो गुलाबी 
रविवार की उस संध्या में 
मैं बैठा हूँ अपनी बालकनी में 


देखता हूँ सामने बच्चों को खेलते 
दूर कहीं कोलाहल होता है 
और सामने छत की मुंडेर पे 
आती है चिड़ियों की चहचहाहट


ऐसे में वो आती है मुझसे मिलने 
एक अकेली चिडियाँ, कितनी सुन्दर 
इधर उधर कुछ बिखड़े दानों को 
चोंच में दबाए वो हो जाती है फुर्र 


पल भर में दूर हो जाती है तन्हाई 
देखता हूँ फिर  मैं उसे 
पेड़ों के झुरमुट में, पत्तों के पीछे 
एक सहज सम्मोहन है जहाँ में 


सोचता हूँ मैं अभी 
क्यूँ बेखबर था इस आनंद से अब तक 
जब शाम रोज ही होती है....
...शायद मुझे फुरसत ही कम होती है.

Saturday, 1 October 2011

काहे का कवि

अनायास ही निकलती है कविता 
यूँ ही हो जाता है कवि कोई 
निकल पड़ते हैं स्वर ऐसे 
नदी में उठे कोई लहर जैसे 
कवि का लिखना भर काम है 
कुछ लिखे कविता उसका नाम है 
अर्थ अनर्थ पाठक करें 
हम क्यों इस पचड़े में पड़ें 
सुन कर फिर चाहे वो झल्लायें 
या पढ़ कर सर खुजाएँ 
नाम छपने भर की अपनी मंशा है
छप जाए यही कविता की प्रशंसा है 
लेखनी जो अब चल पड़ी है 
कविता अपनी निकल पड़ी है 
अब भेजा है जो उनको अपनी रचना 
देखें संपादक जी का क्या जवाब आता है
खुश होकर छापते हैं, या कहें-
मत लिख ऐसी कविता नाम खराब होता है..

बरसात की रात

घुप्प उस अँधेरे में
काली उस रात में
गरजते उमरते बादलों में
घनघोर उस बरसात में
पसरे उस सन्नाटे में










निकलता था कोई संगीत 
बूंदों के टपकने से 
पत्तों में हवाओं के सरकने से 
आसमां में बिजली के कड़कने से 
और खामोशी में दिलों के धड़कने से 

ऐसे में मैं बैठा था,
अकेले में तन्हाई में
जाने सोच की किस गहराई में 
प्यार में, की रुसवाई में 
सोचना फ़िज़ूल था, मज़ा है,
सोने में, तानकर रजाई में /

Friday, 30 September 2011

फूल बिछाये हुए हैं --Bed of Roses

राहों में तेरी हम फूल बिछाये हुए हैं,
आने की तेरी आस , जगाए हुए  हैं,
दरवाजे पर निगाह टिकाये हुए हैं
है अँधेरा अब आने को मगर,
उम्मीदों का चिराग जलाये हैं,

 तुम आओ न आओ, दिल को भरोसा है
तेरे इंतज़ार में कितने पराये हुए हैं.
सब्र मेरा देख कर लोग भरमाये हुए हैं.
दवा की जरूरत न रही अब मुझे
दर्द के इतने सताए हुए हैं.

कह देते लोग मुझे भी पागल, दीवाना,
पर शराफत में शर्माए हुए हैं.
क्या लिखूं गज़ल जब सब गाये हुए हैं,
कहने को तो सब लुट गया, अभिषेक
तेरी याद है जो, दिल में बसाये हुए हैं.



Thursday, 29 September 2011

कवियाया सा

उस थकी दुपहरी में मैंने देखा, 
सूरज को कुछ मुरझाया सा
अजीब सी उस नीरवता में 
हवाओं को भरमाया सा 




चांदी से चमकते पत्तों को
झूलते हुए कुछ घबराया सा 
वक्त को भी मैंने पाया 
उस दिन कुछ अलसाया सा 

फिर किसी पक्षी का स्वर उठा
जैसे कवि कोई पगलाया सा 
सुनकर मानो सूरज चमक उठा
करके जग को चौंधियाया सा 


हवाएँ बह उठीं जैसे कोई 
हाथी चले मदमाया सा 
पत्तों में भी शोर उठा 
पाकर सबको मनभाया सा 

वक्त भी चल पद जैसे 
किसी नदी का पानी 
कहीं धीमा कहीं बल्खाया  सा 
मैंने भी तब खुद को पाया
थोडा थोडा कवियाया सा ..

शायद मेरी पहली कविता

The diary shows the date to be 26/05/96, when i was going in class XI. As can be seen it was like warmup exercise.

ऐ मेरे मन तू कविता कर
साधारण ही सही पर रचना कर
वह रचना जो दिल में बस जाए
तू उसे भूलना चाहे पर भूल ना पाए


वह जो ह्रदय का उदगार हो    
बेतुकी  ही सही  पर अपने को उससे  प्यार हो
आगे भी लिख सकता   हूँ मगर 
ऐ  मेरे  मन  अब  बाद में  कभी तू कविता कर...